February 9, 2026
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35 वर्ष से कम उम्र के लोगों में 60% मानसिक रोग: भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए चेतावनी

  • January 29, 2026
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@नई दिल्ली रिधि दर्पण अरुण शर्माभारत समेत पूरी दुनिया में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक गंभीर और चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी (IPS) ने खुलासा

@नई दिल्ली रिधि दर्पण अरुण शर्मा
भारत समेत पूरी दुनिया में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक गंभीर और चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी (IPS) ने खुलासा किया है कि भारत में लगभग 60 प्रतिशत मानसिक रोग 35 वर्ष से कम उम्र के लोगों में पाए जा रहे हैं। यह जानकारी 77वें वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन ANCIPS-2026 में साझा की गई, जहां देश-विदेश से हजारों मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, शोधकर्ता और नीति-निर्माता एकत्र हुए हैं।
28 से 31 जनवरी तक नई दिल्ली के यशोभूमि में आयोजित इस चार दिवसीय सम्मेलन में विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि मानसिक रोग अब उम्र के अंतिम पड़ाव की समस्या नहीं रहे, बल्कि यह किशोरावस्था और युवावस्था में ही गहराई से पनप रहे हैं। सम्मेलन में प्रस्तुत शोधों के अनुसार मानसिक रोगों की औसत शुरुआत 19 से 20 वर्ष की आयु में हो रही है।
अंतरराष्ट्रीय जर्नल मॉलिक्यूलर साइकियाट्री में प्रकाशित 7 लाख से अधिक लोगों पर आधारित अध्ययन का हवाला देते हुए बताया गया कि


34.6% मानसिक रोग 14 वर्ष से पहले,
48.4% 18 वर्ष से पहले,
और 62.5% रोग 25 वर्ष की आयु तक शुरू हो जाते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार ADHD, एंग्जायटी, ईटिंग डिसऑर्डर, डिप्रेशन, नशे की लत और व्यवहारिक व्यसनों के मामले पहले से कहीं कम उम्र में सामने आ रहे हैं। समय पर इलाज न मिलने पर ये रोग आजीवन विकलांगता और सामाजिक-आर्थिक नुकसान का कारण बन सकते हैं।
डॉ. दीपक राहेजा ने कहा:
“जब 60 प्रतिशत मानसिक रोग 35 वर्ष से कम उम्र में सामने आ रहे हों, तो यह भारत के भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी है। ये वही उम्र है, जब युवा पढ़ाई, करियर और राष्ट्र निर्माण में योगदान देता है। स्कूल-कॉलेज स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता हैं।”
सम्मेलन में आत्महत्या से जुड़े आंकड़ों ने भी चिंता बढ़ाई। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 15 से 29 वर्ष की आयु के लोगों में आत्महत्या मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण बन चुकी है। विशेषज्ञों ने इसका कारण शैक्षणिक दबाव, बेरोजगारी, सामाजिक अलगाव, डिजिटल लत, नशा और भावनात्मक अस्थिरता को बताया।
डॉ. निमेष जी. देसाई ने चेताया:
“डिजिटल दुनिया पर अत्यधिक निर्भरता आने वाले वर्षों में मानसिक समस्याओं को और बढ़ाएगी। समय पर इलाज से अधिकांश मानसिक रोग पूरी तरह ठीक हो सकते हैं। युवावस्था में शुरू हुए रोग अगर अनदेखे रहे, तो जीवनभर साथ चलते हैं।”
विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि 2011 से 2021 के बीच 18 से 25 वर्ष की उम्र के युवाओं में मानसिक तनाव के मामलों में 101.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कोविड-19 महामारी, आर्थिक अनिश्चितता और सामाजिक बदलावों ने इस संकट को और गहरा किया है।
डॉ. सविता मल्होत्रा ने कहा:
“तेजी से बदलती सामाजिक संरचना, डिजिटल तुलना, अकेलापन और रोजगार की अनिश्चितता आज के युवाओं पर भारी दबाव डाल रही है। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को युवा-अनुकूल और कलंक-मुक्त बनाना समय की मांग है।”
डॉ. टी.एस.एस. राव का संदेश:
“यदि भारत को अपनी जनसंख्या की ताकत को अवसर में बदलना है, तो मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और कार्यस्थलों से जोड़ना होगा। मानसिक स्वास्थ्य पर खर्च, राष्ट्र के भविष्य में निवेश है।”
गौरतलब है कि भारत में आज भी 70 से 80 प्रतिशत मानसिक रोगी समय पर इलाज से वंचित हैं। ANCIPS-2026 के माध्यम से इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी बच्चों, किशोरों और युवाओं पर केंद्रित मजबूत नीतियों, बजट वृद्धि और जन-जागरूकता अभियानों की वकालत कर रही है।
सम्मेलन से उभरता संदेश साफ है—
युवाओं में मानसिक रोग तेजी से बढ़ रहे हैं, यह संकट वैश्विक है और अब इसे नजरअंदाज करना पूरी दुनिया के लिए भारी पड़ सकता है।

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