पश्चिम बंगाल में एसआईआर: संविधान, संप्रभुता और लोकतंत्र की निर्णायक परीक्षा — मुनिश कुमार गौड़ का सशक्त दृष्टिकोण
January 24, 2026
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@नई दिल्ली रिधि दर्पण अरुण शर्माभारत का संविधान केवल कानूनों का संकलन नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा है और उस आत्मा की सबसे पवित्र अभिव्यक्ति स्वतंत्र, निष्पक्ष और
@नई दिल्ली रिधि दर्पण अरुण शर्मा भारत का संविधान केवल कानूनों का संकलन नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा है और उस आत्मा की सबसे पवित्र अभिव्यक्ति स्वतंत्र, निष्पक्ष और निष्कलंक चुनाव प्रक्रिया है। पूर्व सिविल सेवक और वरिष्ठ अधिवक्ता मुनिश कुमार गौड़ का मानना है कि पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अब एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि यह राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा का निर्णायक अभियान बन चुकी है। अपने प्रशासनिक अनुभव और संवैधानिक व्याख्या के आधार पर गौड़ स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि जब अवैध घुसपैठ को योजनाबद्ध तरीके से अनदेखा किया जाता है और जनसांख्यिकी को राजनीति का औजार बनाया जाता है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि राज्य द्वारा किया गया राष्ट्रविरोधी कृत्य बन जाता है। सीमावर्ती राज्य बना राजनीतिक प्रयोगशाला
भारत-बांग्लादेश की 2,216 किलोमीटर लंबी सीमा में से लगभग आधी पश्चिम बंगाल से लगती है। दशकों से यह सीमा केवल भौगोलिक रेखा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक प्रयोगशाला बन चुकी है। प्रशासनिक और सुरक्षा आकलनों में सीमावर्ती जिलों में असामान्य जनसंख्या वृद्धि बार-बार सामने आई है, जो अवैध घुसपैठ का स्पष्ट संकेत है। अनुमान है कि आज 40 से 50 लाख अवैध प्रवासी पश्चिम बंगाल की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचना में गहराई से समा चुके हैं। गौड़ के अनुसार यह कोई आकस्मिक मानवीय संकट नहीं, बल्कि राजनीतिक तुष्टिकरण की सोची-समझी नीति का परिणाम है, जिसमें अवैध घुसपैठ को वोट बैंक में बदला गया। मतदाता सूची पर सीधा हमला गौड़ कहते हैं कि मतदाता सूची केवल नामों की सूची नहीं, बल्कि राज्य की वैधता की नींव है। एसआईआर के दौरान सामने आ रहे तथ्य किसी भी जिम्मेदार राष्ट्र की अंतरात्मा को झकझोरने के लिए पर्याप्त हैं। ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां एक व्यक्ति के पास कई पहचान पत्र हैं, फर्जी जन्म और निवास प्रमाण पत्र आसानी से उपलब्ध हैं और अचानक 8 से 12 प्रतिशत मतदाता वृद्धि देखी जा रही है। राज्य सरकार इसे “स्वाभाविक वृद्धि” बताने का प्रयास कर रही है, जबकि स्थानीय प्रशासन की चुप्पी और राजनीतिक दबाव गंभीर सवाल खड़े करते हैं। गौड़ के अनुसार जब कोई अवैध व्यक्ति मतदान करता है, तो वह कानूनी भारतीय नागरिक के मताधिकार की चोरी करता है। यह संविधान के अनुच्छेद 326 का खुला उल्लंघन है और सत्ता द्वारा स्वयं को संविधान से ऊपर रखने की खतरनाक प्रवृत्ति को दर्शाता है। राज्य, प्रशासन और सत्ता का खतरनाक घालमेल एक पूर्व सिविल सेवक के रूप में गौड़ पीड़ा के साथ कहते हैं कि पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार, पुलिस प्रशासन और सत्तारूढ़ दल के बीच की रेखाएं खतरनाक रूप से धुंधली हो चुकी हैं। यदि चुनाव आयोग को एसआईआर के लिए अर्धसैनिक बलों की तैनाती करनी पड़े, तो यह राज्य प्रशासन पर अविश्वास का स्पष्ट प्रमाण है। यह संकेत देता है कि शासन कानून के शासन से नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा से संचालित हो रहा है। मानवाधिकार की आड़ में संविधान का हनन नहीं अधिवक्ता के रूप में गौड़ स्पष्ट करते हैं कि मानवाधिकार का अर्थ संविधान को निलंबित करना नहीं है। अवैध प्रवासियों को मतदान का अधिकार देना न तो मानवाधिकार है और न ही करुणा, बल्कि यह राष्ट्र के विरुद्ध अपराध है। एसआईआर को किसी “विशेष समुदाय” के खिलाफ बताना राजनीतिक भ्रम फैलाने का प्रयास है। चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व केवल इतना है—योग्य को शामिल करना और अयोग्य को बाहर करना। इससे अधिक निष्पक्ष प्रक्रिया हो ही नहीं सकती। संगठित वोटर कार्ड घोटाले और फर्जी नागरिकता नेटवर्क गौड़ चेतावनी देते हैं कि पश्चिम बंगाल में वोटर कार्ड घोटाले और फर्जी नागरिकता रैकेट संगठित रूप से संचालित हो रहे हैं। उन्होंने इसे लोकतंत्र के खिलाफ दस्तावेजी आतंकवाद करार दिया। मीडिया और प्रशासनिक रिपोर्टों में सामने आया है कि बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को फर्जी पतों पर ईपीआईसी कार्ड जारी किए गए, बीएलओ स्तर पर सत्यापन केवल औपचारिकता बनकर रह गया और स्थानीय प्रभावशाली तत्वों ने प्रमाणन में भूमिका निभाई। शिक्षा व्यवस्था के जरिए फर्जी नागरिकता और भी चिंताजनक तथ्य यह है कि शिक्षा व्यवस्था का दुरुपयोग फर्जी नागरिकता का रास्ता बन गया है। रिपोर्टों के अनुसार, निजी स्कूलों में अवैध प्रवासियों के बच्चों को फर्जी माता-पिता और गलत जन्म तिथियों के साथ दाखिला दिया गया। राज्य बोर्ड के प्रमाण पत्र आगे चलकर आधार, राशन कार्ड और वोटर आईडी का आधार बनते हैं। कई मामलों में एक व्यक्ति को 300 से अधिक बच्चों का पिता दिखाया गया, पिता-पुत्र की उम्र में केवल 5–7 वर्ष का अंतर पाया गया, जबकि असली माता-पिता सीमा पार रहते हैं। फैमिली रजिस्टर: एसआईआर का सबसे प्रभावी हथियार गौड़ के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम पंचायत फैमिली रजिस्टर और शहरी क्षेत्रों में नगरपालिका हाउसहोल्ड रजिस्टर एसआईआर के सबसे प्रभावी उपकरण हैं। इनमें पीढ़ियों की जानकारी होती है, जिससे कागजी परिवारों का पर्दाफाश संभव है। यदि मतदाता सूची का मिलान इन रजिस्टरों से किया जाए, तो यह तुरंत स्पष्ट हो जाएगा कि किसके पूर्वज सीमा पार हैं और कौन अवैध रूप से मतदान कर रहा है। राष्ट्र की परीक्षा मुनिश कुमार गौड़ के शब्दों में, “पश्चिम बंगाल में यह केवल चुनाव नहीं, बल्कि राष्ट्र की परीक्षा है।” जिस भूमि ने वंदे मातरम्, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसी विभूतियां दीं, वहां यदि राष्ट्रवादी स्वर दबाए जाएं, तो यह लोकतंत्र के लिए चेतावनी संकेत है। यदि आज एसआईआर राजनीतिक दबाव में कुचल दी गई, तो कल लोकतंत्र केवल नाम मात्र रह जाएगा। यह तटस्थ रहने का समय नहीं, बल्कि संविधान के पक्ष में दृढ़ता से खड़े होने का समय है।
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