February 9, 2026
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अस्पताल बने असुरक्षा के मैदान!

  • January 17, 2026
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दिल्ली सरकार का बड़ा फैसला: संवेदनशील इलाकों में नाइट शेल्टरों की संख्या बढ़ेगी नई दिल्ली | हरि सिंह रावत रिधि दर्पण राजधानी के सरकारी अस्पताल, जहां मरीजों को

दिल्ली सरकार का बड़ा फैसला: संवेदनशील इलाकों में नाइट शेल्टरों की संख्या बढ़ेगी

नई दिल्ली | हरि सिंह रावत रिधि दर्पण


राजधानी के सरकारी अस्पताल, जहां मरीजों को जीवनदान मिलना चाहिए, वहीं अब डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के लिए असुरक्षा का कारण बनते जा रहे हैं। दिल्ली सरकार के आंकड़े एक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं—पिछले पांच वर्षों में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों पर हमलों की 149 घटनाएं सामने आई हैं, लेकिन इनमें से केवल 33 मामलों में ही FIR दर्ज की गई।


सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 और 2022 में जहां हर साल 14-14 हमले दर्ज हुए, वहीं 2023 में यह संख्या बढ़कर 24 पहुंच गई। 2024 में हालात और बिगड़े और हमलों की संख्या 49 हो गई। वर्ष 2025 में अब तक 48 हमले दर्ज किए जा चुके हैं, जो यह संकेत देता है कि समस्या थमने के बजाय लगातार गंभीर होती जा रही है।
स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि भीड़भाड़, डॉक्टरों और स्टाफ की कमी, लंबा इंतजार और आपातकालीन वार्डों में तनावपूर्ण माहौल इन घटनाओं की बड़ी वजह बन रहा है। कई बार मरीजों के परिजनों का गुस्सा हिंसा में बदल जाता है, जिसका सीधा निशाना डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ बनते हैं।
हालांकि सरकार ने अस्पतालों में सुरक्षा समितियों के गठन, गार्डों की तैनाती, CCTV कैमरे, हेल्पलाइन नंबर और दिल्ली पुलिस के साथ समन्वय जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन लगातार बढ़ती घटनाएं इन उपायों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर रही हैं।
हालिया मामलों ने बढ़ाई चिंता


अगस्त 2025 में सुचेता कृपलानी अस्पताल में डॉक्टर और एक्स-रे तकनीशियन पर हमला
अगस्त 2025 में मोती नगर स्थित आचार्य भिक्षु अस्पताल में इंटर्न से मारपीट
जून 2025 में डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर अस्पताल, रोहिणी में महिला रेजिडेंट डॉक्टर पर हमला
जून 2025 में GTB अस्पताल में वरिष्ठ डॉक्टर पर शराब की बोतल से हमला
डॉक्टर संगठनों का कहना है कि बड़ी संख्या में मामले डर, दबाव या कार्रवाई न होने की आशंका के कारण दर्ज ही नहीं हो पाते। उनका आरोप है कि जब तक डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए सख्त और अलग कानून नहीं बनाया जाएगा, तब तक हालात में सुधार मुश्किल है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए अलग कानून लाने पर विचार नहीं किया जा रहा और मौजूदा IPC प्रावधानों के तहत ही कार्रवाई की जाएगी। लेकिन डॉक्टरों का सवाल साफ है—जब इलाज करने वाले ही सुरक्षित नहीं, तो मरीजों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी?
यह मुद्दा अब सिर्फ स्वास्थ्यकर्मियों का नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल बन चुका

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