यमुना एक्सप्रेसवे भूमि विवाद पर किसानों को झटका
- January 11, 2026
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नोएडा | विशेष संवाददाता: अरुण शर्मा यमुना एक्सप्रेसवे से जुड़ी भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को चुनौती देने वाले किसानों को एक बार फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली
नोएडा | विशेष संवाददाता: अरुण शर्मा यमुना एक्सप्रेसवे से जुड़ी भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को चुनौती देने वाले किसानों को एक बार फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली
नोएडा | विशेष संवाददाता: अरुण शर्मा
यमुना एक्सप्रेसवे से जुड़ी भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को चुनौती देने वाले किसानों को एक बार फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली है। हाईकोर्ट ने यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) के तहत किए गए भूमि अधिग्रहण मामलों को दोबारा खोलने से इनकार करते हुए किसानों की नई याचिकाएं खारिज कर दीं।
6 जनवरी को पारित आदेश में न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति कुणाल रवि सिंह की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि इस मामले से जुड़े मूल कानूनी प्रश्नों पर पहले ही अंतिम निर्णय हो चुका है, जिनमें सर्वोच्च न्यायालय के फैसले भी शामिल हैं। ऐसे में मामलों को फिर से सुनवाई के लिए खोलने का कोई औचित्य नहीं बनता।
अदालत ने वर्ष 2009 से 2011 के बीच दनकौर तहसील के पारसोल, निलोनी शाहपुर, राबूपुरा, चांदपुर और अचैयपुर गांवों में हुए भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली 14 रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया।
याचिकाकर्ता किसानों का दावा था कि वे भूमिधर (भुमिधर) हैं और उनके पास स्थानांतरण योग्य अधिकार हैं। उन्होंने भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 4 और 6, साथ ही धारा 17(1) और 17(4) के तहत जारी अधिसूचनाओं को चुनौती दी थी। किसानों का तर्क था कि इन धाराओं के तहत आपातकालीन प्रावधान लागू कर धारा 5-ए के तहत आपत्ति का अधिकार समाप्त कर दिया गया, जो अनुचित है।
वहीं YEIDA ने अदालत में दलील दी कि यह भूमि अधिग्रहण यमुना एक्सप्रेसवे कॉरिडोर से जुड़े एक बड़े, एकीकृत और समयबद्ध विकास योजना का हिस्सा है। प्राधिकरण ने कहा कि परियोजना की प्रकृति और समयसीमा को देखते हुए आपात प्रावधानों का प्रयोग आवश्यक था।
हाईकोर्ट ने YEIDA की दलीलों से सहमति जताते हुए कहा कि अधिग्रहण नियोजित विकास के लिए किया गया था और इसमें कोई कानूनी खामी नहीं पाई गई।
इस फैसले को यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र में चल रही विकास परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण कानूनी समर्थन के रूप में देखा जा रहा है, वहीं किसानों के लिए यह फैसला एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
