January 15, 2026
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दिल्ली हाईकोर्ट ने नर्सिंग व पैरामेडिकल स्टाफ के नियमितीकरण का रास्ता खोला

  • November 26, 2025
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यह ऐतिहासिक फैसला 23 वर्षों की लंबी प्रतीक्षा,संघर्ष और पीड़ा का अंत लेकर आया:- मोनिका अरोड़ा अरुण शर्मा रिधि दर्पण! नई दिल्ली, अनिल चौहान:-दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में

यह ऐतिहासिक फैसला 23 वर्षों की लंबी प्रतीक्षा,संघर्ष और पीड़ा का अंत लेकर आया:- मोनिका अरोड़ा

अरुण शर्मा रिधि दर्पण!

नई दिल्ली, अनिल चौहान:-दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में बीते 15–20 वर्षों से दिन-रात सेवा देने वाले नर्सिंग और पैरामेडिकल कर्मचारियों के लिए 10 नवंबर 2025 का दिन सिर्फ़ एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि 23 वर्षों की लंबी प्रतीक्षा, संघर्ष और पीड़ा का अंत लेकर आया। कर्मचारियों का कहना है कि वे सन् 2002 से अपनी सेवाओं और अधिकारों के लिए लगातार कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं—कभी उम्मीद की किरण दिखाई देती, तो कभी प्रशासनिक निराशा घेर लेती थी। हाईकोर्ट ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में कहा कि इन कर्मचारियों की सेवाएँ “निरंतर, आवश्यक और नियमित प्रकृति की” रही हैं। इसलिए इनका नियमितीकरण कोई दया नहीं—बल्कि उनका वैधानिक अधिकार है। हमारे त्याग और आंसुओं को आखिरकार न्याय मिला, कई कर्मचारियों की आँखें भर आईं। उन्होंने कहा कि यह फैसला उन सभी रातों की जीत है, जब वे ड्यूटी पर थे और घरों में परिवार उनका इंतज़ार करता रहा। यह उन त्योहारों की जीत है जो अस्पताल की गलियों में गुज़रे। यह उन महीनों की जीत है जब महामारी के दौरान बच्चों को गले भी नहीं लगा सके। उनका कहना था आज पहली बार लगा कि हमारे संघर्ष को किसी ने सच में सुना है। एडवोकेट मोनिका अरोड़ा का अहम योगदान रहा वह हमारी रोशनी बनकर खड़ी रहीं।कर्मचारियों ने हमसे विशेष बातचीत के दौरान यह भी कहा कि 23 वर्षों की लड़ाई बेहद लंबी, जटिल और थकाने वाली थी। लेकिन जिस दृढ़ता, सटीक कानूनी समझ और मातृत्व जैसी संवेदना के साथ एडवोकेट मोनिका अरोड़ा हमारे साथ खड़ी रहीं, वह हमारे लिए

आदर्श मार्गदर्शक बनी। उन्होंने कहा कि वकील साहिबा ने न केवल हमारा केस लड़ा, बल्कि हर सुनवाई में कर्मचारियों की पीड़ा और भावनाओं को अदालत के सामने दमदार आवाज़ दी। हमसे बातचीत के दौरान कुछ कर्मचारियों की भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ कुछ इस प्रकार हमारे सामने आईं जैसे अशोक कुमार ने हमसे कहा पिछले 20 साल से अस्पताल ही हमारा दूसरा घर है, यह फैसला हमारे लिए आज सम्मान की वापसी है।पंकज शुक्ला ने बताया कि इस फैसले ने हमारे बच्चों की आंखों में उम्मीद लौटा दी है हम अपने बच्चों से अक्सर यही कहा करते थे बस एक बार यह केस जीत जाएं और आज यह दिन आ गया। रुचि नारायण ने यह कहा महामारी में हमने अपनी जान कई बार दांव पर और हमें ऐसा प्रतीत हुआ कि शायद हमारी कुर्बानियों कभी दिखाई ही नहीं देगी लेकिन इस फैसले ने यह साबित कर दिया देर है मगर अंधेर नहीं। आखिर में मोहम्मद आसिम ने अपनी भावना व्यक्त करते हुए कहा कि वर्षों की प्रतीक्षा ने हमारे परिवारों में डर पैदा कर दिया की नौकरी का क्या होगा ? बच्चों का भविष्य क्या होगा? यह ऐतिहासिक फैसला उन सभी डर को खत्म करता है।
अन्य कर्मचारियों का संयुक्त और भावनात्मक बयान संयुक्त बयान में नितिन आत्रे, रुचि कौशिक, चंद्रमोहन आर्या, दिवाकर सिंह, अब्दुर रहमान ,कृष्ण कुमार, नर्सिंग आफीसर मेघा मसीह,सी बी रात्रा,अनु बाला कुमारी और अन्य सदस्यों ने कहा-हम 2002 से संघर्षरत हैं। कर्मचारियों दिल्ली सरकार से आग्रह किया है अदालत के आदेश को बिना देरी लागू किया जाए। नियमितीकरण की प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा किया जाए।

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