जो दूसरों का दर्द मिटाती हैं, उनके अपने दर्द पर चुप क्यों है सिस्टम?
- November 6, 2025
- 0
नई दिल्ली अरूण शर्मा जी.बी. पंत अस्पताल की नर्स को नहीं मिला इलाज का बिस्तर — स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल देश की राजधानी के नामचीन सरकारी अस्पताल
नई दिल्ली अरूण शर्मा जी.बी. पंत अस्पताल की नर्स को नहीं मिला इलाज का बिस्तर — स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल देश की राजधानी के नामचीन सरकारी अस्पताल
नई दिल्ली अरूण शर्मा
जी.बी. पंत अस्पताल की नर्स को नहीं मिला इलाज का बिस्तर — स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल
देश की राजधानी के नामचीन सरकारी अस्पताल जी.बी. पंत में एक नर्स को इलाज के लिए बिस्तर न मिलना केवल एक अस्पताल की लापरवाही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता की तस्वीर है।
लगभग 18 वर्षों से अस्पताल में सेवा दे रही नर्स खुद बीमार पड़ीं, लेकिन उन्हें भर्ती के लिए बिस्तर नहीं मिला। बताया गया कि नर्स को न्यूरो से संबंधित गंभीर बीमारी थी और उन्हें तत्काल भर्ती की आवश्यकता थी।
लेकिन अस्पताल प्रशासन की लचर व्यवस्था और विभागीय प्रक्रिया के कारण उन्हें लंबे इंतजार के बाद भी भर्ती नहीं किया गया। यह घटना तब और दर्दनाक बन जाती है जब वही नर्सें हर दिन सैकड़ों मरीजों की देखभाल करती हैं — लेकिन अपने ही अस्पताल में उन्हें जगह नहीं मिलती।

नर्स एसोसिएशन ने जताया आक्रोश
“यह अत्यंत दुखद है कि जो नर्सें दिन-रात मरीजों की सेवा करती हैं, उन्हें अपने संकट के समय अस्पताल के दरवाज़ों पर भटकना पड़ रहा है। यह केवल सिस्टम की विफलता नहीं, बल्कि मानवता के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।”
एसोसिएशन ने अस्पताल निदेशक को पत्र भेजकर पूरी घटना की जांच की मांग की है और कहा है कि भविष्य में कोई भी स्वास्थ्यकर्मी इस तरह की स्थिति का सामना न करे
स्वास्थ्य जगत में नर्सों को अस्पताल की रीढ़ कहा जाता है।
वे मरीजों की देखभाल, दवाओं का समय पर वितरण, और आपात स्थिति में चिकित्सकों की सबसे बड़ी सहायक होती हैं। लेकिन जब वही सेवा देने वाली नर्स खुद के इलाज के लिए बिस्तर की हकदार न बन सके — तो यह पूरे सिस्टम पर गहरा सवाल है।
स्वास्थ्यकर्मियों में बढ़ी नाराजगी
इस घटना से अस्पताल में कार्यरत स्वास्थ्यकर्मियों में असंतोष है।
कर्मचारियों का कहना है कि अगर वर्षों से सेवा देने वाले स्टाफ को भी समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिलेगी, तो यह पूरे स्टाफ का मनोबल तोड़ देगा।
कई स्वास्थ्यकर्मियों ने कहा कि ऐसी घटनाएं कार्यस्थल पर “असुरक्षा और उपेक्षा” का भाव पैदा करती हैं, जिससे सेवाओं की गुणवत्ता पर भी असर पड़ सकता है।
यह मामला केवल एक नर्स का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जिसमें “सेवा करने वाले” को ही अपने अधिकार के लिए लड़ना पड़ता है।
सरकारी अस्पतालों को अब यह सोचने की ज़रूरत है कि —
जो दूसरों का दर्द मिटाती हैं, उनके अपने दर्द पर चुप क्यों है सिस्टम