संतुलित आहार ही असली दवा: विशेषज्ञों ने बताया क्यों भारत को बदलनी होगी अपनी थाली
- November 4, 2025
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नई दिल्ली हरि सिंह रावत रिधि दर्पण। भारत में लोग आज पहले से ज़्यादा खाते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे सही खा रहे हों। विशेषज्ञों का कहना
नई दिल्ली हरि सिंह रावत रिधि दर्पण। भारत में लोग आज पहले से ज़्यादा खाते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे सही खा रहे हों। विशेषज्ञों का कहना
नई दिल्ली हरि सिंह रावत रिधि दर्पण।
भारत में लोग आज पहले से ज़्यादा खाते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे सही खा रहे हों। विशेषज्ञों का कहना है कि देश अब एक नई स्वास्थ्य चुनौती का सामना कर रहा है—कुपोषण से मोटापे की ओर बढ़ता भारत।
AIIMS नई दिल्ली में आयोजित साउथ एशियन पैरेंट्रल एंड एंट्रल न्यूट्रिशन (SAPEN) सम्मेलन में विशेषज्ञों ने कहा कि समस्या सिर्फ खाने की मात्रा की नहीं, बल्कि “खाने के संतुलन” की है।
“भारत में लोग ज़रूरत से ज़्यादा कार्बोहाइड्रेट यानी चावल, रोटी, डोसा और इडली खाते हैं, जबकि प्रोटीन और फाइबर बहुत कम लेते हैं,” बताया डॉ. पी.सी. विजयकुमार, अध्यक्ष, SAPEN ने। “यह आदत डायबिटीज़, फैटी लिवर और मोटापे जैसी बीमारियों की जड़ है।”

62% भारतीय कैलोरी कार्बोहाइड्रेट से आती है
विशेषज्ञों के मुताबिक, औसतन एक भारतीय अपने दैनिक कैलोरी का 62 प्रतिशत हिस्सा कार्बोहाइड्रेट से लेता है, जबकि यह अनुपात 50 से 52 प्रतिशत के बीच होना चाहिए।
“डायबिटीज़ के मरीजों के लिए यह और भी कम होना चाहिए,” कहते हैं डॉ. शिवशंकर तिम्मनप्याती, अध्यक्ष, IAPEN इंडिया।
वे कहते हैं, “कार्बोहाइड्रेट कम करें और उसकी जगह प्रोटीन व हेल्दी फैट जैसे मछली का तेल, सोया, नट्स और अलसी के बीज शामिल करें।”
“प्रोटीन कोई विलासिता नहीं, आवश्यकता है”
डॉ. बीजू पोट्टाकोट, उपाध्यक्ष, IAPEN ने कहा कि भारत में अब भी बहुत से लोग प्रोटीन को महंगा मानते हैं। “यह सबसे बड़ी गलती है। संतुलित आहार में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और फैट का सही मिश्रण होना चाहिए। अगर हम प्रोटीन को नज़रअंदाज़ करते रहे, तो देश में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ और बढ़ेंगी।”
उन्होंने बताया कि जापान और दक्षिण अमेरिकी देशों ने अपने भोजन में प्रोटीन को प्राथमिकता देकर मोटापा और डायबिटीज़ जैसी समस्याओं को काफी हद तक नियंत्रित किया है।
हर घर की थाली में संतुलन जरूरी
विशेषज्ञों ने बताया कि भोजन की आदतें घर से शुरू होती हैं। “जब बच्चे अच्छे अंक लाते हैं, हम उन्हें जंक फूड देकर पुरस्कृत करते हैं,” कहती हैं डॉ. शिल्पा वर्मा, निदेशक, IAPEN। “हमें यह सोच बदलनी होगी और हेल्दी फूड को आकर्षक बनाना होगा।”
उन्होंने कहा कि गर्भावस्था के दौरान माँ का पोषण बच्चे के पूरे जीवन पर असर डालता है, इसलिए पोषण की शुरुआत जन्म से पहले ही होनी चाहिए।
निष्कर्ष: “कम नहीं, सही खाइए”
सम्मेलन में एक स्वर में यह संदेश दिया गया कि भारत की सबसे बड़ी चुनौती “जागरूकता” की है।
“स्वस्थ रहना कम खाने से नहीं, सही खाने से संभव है,” डॉ. विजयकुमार ने कहा। “भोजन ही हमारी पहली दवा है — बस उसे समझदारी से चुनने की ज़रूरत है।”