January 15, 2026
उत्तराखंड

जीवन पथ “गढ़वाली संवेदना की पगडंडी : ‘जिन्दग्या बाटा मा’ अब नरेंद्र कठैत की लेखनी से पढ़ी जाएगी”

  • October 28, 2025
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@उत्तराखंड नरेंद्र कठैत रिधि दर्पण किताब ‘जिन्दग्या बाटा मा’ इसलिए विशेष नहीं है कि यह डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ जैसी प्रतिष्ठित रचनात्मक हस्ती की कृति का गढ़वाली रूप

@उत्तराखंड नरेंद्र कठैत रिधि दर्पण

किताब ‘जिन्दग्या बाटा मा’ इसलिए विशेष नहीं है कि यह डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ जैसी प्रतिष्ठित रचनात्मक हस्ती की कृति का गढ़वाली रूप है, बल्कि इसलिए कि इसे नरेंद्र कठैत ने अपने हृदय और अनुभव की भाषा में पुनर्जन्म दिया है। यह पुस्तक गढ़वाली साहित्य के लिए एक मील का पत्थर इसलिए बनती है, क्योंकि इसमें भाषा केवल माध्यम नहीं रही—यह स्वयं एक जीवंत पात्र के रूप में उभरती है।

नरेंद्र कठैत ने इस कृति के अनुवाद के साथ जो भूमिका लिखी है, वह महज़ औपचारिक परिचय नहीं, बल्कि एक गहरी भाषाई चेतना का दस्तावेज़ है। उन्होंने हिंदी और गढ़वाली के संबंध को “पगडंडी से राजमार्ग” तक की यात्रा के रूप में देखा है। हिंदी जहाँ एक सुसंगठित सड़क का रूप ले चुकी है, वहीं गढ़वाली अपनी असमतल, पर सजीव पगडंडियों में जीवन की असली गंध समेटे हुए है। नरेंद्र ने इन दोनों के बीच ऐसा हाइवे बनाया है, जिस पर न केवल शब्द, बल्कि संस्कृति, स्मृति और पहचान भी चलती हैं।

उनकी भूमिका यह दर्शाती है कि अनुवाद उनके लिए केवल भाषाई अभ्यास नहीं, बल्कि एक भावनात्मक संकल्प है। उन्होंने निशंक की कविताओं को गढ़वाली ढब-ढांचे में ढालकर यह सिद्ध किया कि मातृभाषा में हर अर्थ की एक नई रोशनी होती है। उनके शब्दों में, भाषा की आत्मा तभी जीवित रहती है जब वह अपने लोक, अपने जन और अपनी मिट्टी से जुड़ी रहती है।

‘जिन्दग्या बाटा मा’ के माध्यम से नरेंद्र कठैत ने यह भी दिखाया कि अनुवादक दरअसल एक सेतु-निर्माता होता है। वह न केवल दो भाषाओं को जोड़ता है, बल्कि दो संवेदनाओं, दो संस्कृतियों और दो युगों के बीच संवाद स्थापित करता है। यही वजह है कि यह किताब निशंक जी की रचना से आगे जाकर नरेंद्र कठैत की संवेदनशील दृष्टि का भी साक्ष्य बन जाती है।

गढ़वाली साहित्य में हाल के वर्षों में जो सबसे अर्थपूर्ण घटनाएँ हुई हैं, उनमें डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के कविता-संग्रह ‘जीवन-पथ में’ का गढ़वाली अनुवाद ‘जिन्दग्या बाटा मा’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। लेकिन इस कृति का सबसे गहरा पक्ष वह भूमिका है, जिसे अनुवादक नरेंद्र कठैत ने लिखा है। यह भूमिका किसी औपचारिक भूमिका की तरह नहीं पढ़ी जाती — यह अपने आप में एक साक्षात्कार है, एक मंथन है, जिसमें लेखक अपनी भाषा, पहचान और अनुभवों से संवाद करता दिखाई देता है।

नरेंद्र कठैत पुस्तक की भूमिका में सबसे पहले उस दूरी को स्वीकार करते हैं, जो आधुनिक शिक्षा ने भाषा और मातृभूमि के बीच बना दी है। वे लिखते हैं कि उन्होंने पढ़ना-लिखना हिंदी में सीखा, पर बोलना–सोचना अब भी गढ़वाली में ही सहज लगता है। यही स्वीकारोक्ति उनके पूरे विचार का प्रारंभिक सूत्र है — एक ऐसा सूत्र जो ईमानदार है, असुविधाजनक भी, और अत्यंत आत्मीय भी।

भूमिका का स्वर आत्मकथात्मक होते हुए भी आत्ममुग्ध नहीं है। नरेंद्र कठैत यह नहीं कहते कि उन्होंने कोई उपलब्धि प्राप्त की है; बल्कि वे इस बात को रेखांकित करते हैं कि भाषा के प्रति अपने कर्तव्य को समझने की प्रक्रिया अब भी जारी है। उनका लेखन आत्मनिरीक्षण के स्वर में है — जैसे कोई व्यक्ति अपने भीतर झाँक कर अपनी ही बोली से प्रश्न कर रहा हो कि “मैं अब भी तेरे पास हूँ या तुझसे दूर चला गया हूँ?”

इस भूमिका की सबसे खास बात यह है कि नरेंद्र कठैत गढ़वाली और हिंदी के संबंध को टकराव नहीं, सह-अस्तित्व के रूप में देखते हैं। वे कहते हैं कि गढ़वाली का विकास तभी होगा जब वह अन्य भाषाओं तक पहुँचेगी और उनसे कुछ ग्रहण करेगी। यह दृष्टिकोण गढ़वाली साहित्य में दुर्लभ है, क्योंकि प्रायः स्थानीय भाषाओं के पक्षधर हिंदी को प्रतिस्पर्धी के रूप में देखते हैं। नरेंद्र कठैत की दृष्टि इस बंधन से परे है — वे संवाद में विश्वास करते हैं।

भूमिका में जगह-जगह उनके गहरे भावनात्मक संकेत दिखाई देते हैं। “अपड़ा गाँ-गुठ्यार” जैसे शब्दों में एक पूरा जीवन बसता है — गाँव की मिट्टी, वहाँ के लोग, वहाँ की बोली और उस जीवन की लय। नरेंद्र कठैत इन्हें केवल स्मृति के रूप में नहीं, बल्कि सृजन के आधार के रूप में स्वीकारते हैं। उनका मानना है कि लेखक जब तक अपने लोक से जुड़ा नहीं रहेगा, उसकी भाषा में दम नहीं रहेगा।

उन्होंने हिंदी से प्रभावित होने या उस पर निर्भर रहने को किसी दोष के रूप में नहीं देखा। बल्कि यह कहा कि हिंदी ने उन्हें विचार और अभिव्यक्ति की दिशा दी, जबकि गढ़वाली ने उन्हें आत्मा दी। यह सम्मिलन दृष्टि नरेंद्र कठैत को एक आधुनिक लोक-लेखक बनाती है — जो परंपरा से प्रेम करता है, पर परंपरा में कैद नहीं रहता।

भूमिका के उत्तरार्ध में नरेंद्र कठैत अपने अनुवाद-प्रयास की चर्चा करते हैं। वे बताते हैं कि गढ़वाली ढब और ढाँचे में हिंदी कविताओं को रूपांतरित करना कितना कठिन था। यह प्रक्रिया केवल भाषा का नहीं, भाव का रूपांतरण थी। यहाँ वे एक रचनात्मक जिम्मेदारी निभाते हैं — वे कवि निशंक की आत्मा को बचाए रखते हुए, उसे गढ़वाली के लोकस्वर में गूँथ देते हैं।

भूमिका की अंतिम पंक्तियाँ इस संपूर्ण विचारयात्रा का सार बन जाती हैं। वे माँ सरस्वती से प्रार्थना करते हैं कि यह रचना नई पीढ़ी तक पहुँचे और गढ़वाली भाषा का मान बढ़े। यह प्रार्थना अनुवादक की विनम्रता नहीं, उसकी आत्मसजगता का प्रमाण है। यह उस लेखक का वक्तव्य है जो जानता है कि भाषा का सम्मान केवल भाषणों से नहीं, कर्म से मिलता है।

उनकी यह रचना हमें यह समझाती है कि मातृभाषा से प्रेम करना कोई भावनात्मक आग्रह नहीं, बल्कि एक विचारशील कर्म है। ‘जिन्दग्या बाटा मा’ के आरंभ में लिखी गई यह भूमिका इसलिए विशेष है कि वह गढ़वाली को केवल भाषा नहीं, एक जीवित चेतना के रूप में देखती है ।

किताब ‘जिन्दग्या बाटा मा’ को अब केवल डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की आभा में नहीं, बल्कि नरेंद्र कठैत की लेखनी की दृष्टि से पढ़ा जाएगा। निशंक जी की रचनाएँ निस्संदेह हिंदी साहित्य में अपनी जगह रखती हैं, पर इस गढ़वाली रूपांतरण में जो गहराई, लोकगंध और भाषाई आत्मा जुड़ी है, वह नरेंद्र कठैत की संवेदनशीलता और रचनात्मक दृष्टि का परिणाम है।

नरेंद्र ने इन कविताओं को केवल अनूदित नहीं किया, उन्होंने इन्हें जीया है — जैसे हर पंक्ति उनके अपने गाँव की मिट्टी से निकली हो, हर शब्द उनके भीतर के लोक की गूँज बन गया हो। उन्होंने गढ़वाली में केवल शब्दों को नहीं, बल्कि जीवन के रौ-भौ को उतारा है। यही कारण है कि ‘जिन्दग्या बाटा मा’ अब एक कवि की कविताओं का नहीं, बल्कि एक अनुवादक की आत्माभिव्यक्ति का ग्रंथ बन गई है।

इस किताब में नरेंद्र कठैत का दृष्टिकोण किसी “सहायक अनुवादक” का नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र रचनाकार का है। उन्होंने भाषा को महज रूपांतरण का माध्यम नहीं, बल्कि एक नई चेतना का स्रोत माना है। उनकी भूमिका और अनुवाद यह स्पष्ट कर देते हैं कि गढ़वाली केवल बोली नहीं, बल्कि विचार की भी भाषा है। उन्होंने हर कविता में गढ़वाली जीवन की पगडंडियों, लोक-रीति और संवेदना को इस तरह पिरोया है कि पाठक को लगता है—यह निशंक की नहीं, बल्कि नरेंद्र की ही आत्मा की अभिव्यक्ति है।

इस दृष्टि से ‘जिन्दग्या बाटा मा’ अब किसी प्रसिद्ध नाम की छाया में पढ़ी जाने वाली पुस्तक नहीं रही। यह अब उस लेखक की गवाही है जिसने अपनी मातृभाषा के स्वरों को हिंदी के हाइवे पर चलने लायक बनाया, बिना उसकी मिट्टी खोए। आने वाले समय में यह पुस्तक नरेंद्र कठैत की लेखनी के परिपक्व, संवेदनशील और सांस्कृतिक गहराई के लिए जानी जाएगी — और शायद यही इसका सबसे बड़ा सम्मान होगा।

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