2045 तक भारत में कैंसर का अलार्म: 15 लाख से 24.5 लाख सालाना मामलों का खतरा, समय पर जांच ही सबसे बड़ा हथियार
February 4, 2026
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@नई दिल्ली हरि सिंह रावत रिधि दर्पण भारत एक बड़े स्वास्थ्य संकट की ओर बढ़ रहा है। अनुमान है कि 2045 तक देश में नए कैंसर मामलों की
@नई दिल्ली हरि सिंह रावत रिधि दर्पण
भारत एक बड़े स्वास्थ्य संकट की ओर बढ़ रहा है। अनुमान है कि 2045 तक देश में नए कैंसर मामलों की संख्या 15 लाख से बढ़कर 24.5 लाख सालाना हो जाएगी। यह चेतावनी इंडियन कैंसर सोसायटी (ICS), दिल्ली ने दी है। विशेषज्ञों का साफ़ कहना है कि अगर समय पर जांच, रोकथाम और शुरुआती पहचान को राष्ट्रीय प्राथमिकता नहीं बनाया गया, तो हालात बेहद गंभीर हो सकते हैं। यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब केंद्रीय बजट 2026-27 में भारत सरकार ने कैंसर उपचार को सुलभ और किफायती बनाने के लिए कई ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। कैंसर दवाओं पर कस्टम ड्यूटी में कटौती, घरेलू दवा निर्माण को बढ़ावा और इलाज की पहुंच बढ़ाने के प्रावधान सरकार के उस विज़न को दर्शाते हैं, जिसमें “इलाज के साथ-साथ जीवन बचाना” प्राथमिक लक्ष्य है। बजट 2026-27: कैंसर के खिलाफ निर्णायक वार
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बजट की खुलकर सराहना करते हुए कहा कि कैंसर दवाएं सस्ती होंगी, घरेलू उत्पादन से आत्मनिर्भर भारत को बल मिलेगा, और मरीजों पर आर्थिक बोझ कम होगा। हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी आगाह किया कि केवल इलाज नहीं, बल्कि रोकथाम और शुरुआती पहचान पर समान ज़ोर देना ही कैंसर से जंग जीतने का रास्ता है। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में गंभीर मंथन मंगलवार को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित मीडिया संवाद में सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और कैंसर विशेषज्ञों ने भारत में कैंसर के बढ़ते खतरे, जांच और उपचार की खामियों तथा समग्र राष्ट्रीय रणनीति की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। आईसीएस दिल्ली की प्रवक्ता ने कहा, “बजट 2026 ने इलाज को लेकर राहत दी है, लेकिन आईसीएस का फोकस मरीजों तक जल्दी पहुंच बनाकर शुरुआती स्तर पर हस्तक्षेप करना है।” उन्होंने बताया कि 1983 से आईसीएस दिल्ली नीतियों और ज़मीनी स्तर के बीच की खाई को पाटने का काम कर रही है। विशेषज्ञों की दो टूक राय: रोकथाम ही असली समाधान प्रो. ज्योत्सना गोविल (चेयरपर्सन, आईसीएस दिल्ली) उन्होंने कहा कि जोखिम कारकों को कम करना, समय पर जांच और वैज्ञानिक जानकारी को आम लोगों तक पहुंचाना बेहद ज़रूरी है। “कैंसर के खिलाफ लड़ाई केवल अस्पतालों में नहीं, समाज में जीती जाती है।” डॉ. तितिर रोहातगी (सीनियर डायरेक्टर, ऑन्कोलॉजी, फोर्टिस हॉस्पिटल) उन्होंने उम्र के अनुसार स्क्रीनिंग, आधुनिक डायग्नोस्टिक तकनीकों और शुरुआती पहचान को मौतों को कम करने की कुंजी बताया। डॉ. उषा राव (पूर्व निदेशक, नीति आयोग | कैंसर सर्वाइवर) उन्होंने कैंसर डेटा की कमी, क्षेत्रीय असमानताओं और इलाज की ऊंची लागत को बड़ी चुनौती बताया। “केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय और निरंतर सार्वजनिक निवेश ही बदलाव ला सकता है।” श्रीमती रुक्मा प्रसाद (सचिव, आईसीएस दिल्ली | कैंसर सर्वाइवर) उन्होंने कैंसर के भावनात्मक, शारीरिक और आर्थिक दर्द को सामने रखा और बताया कि ‘प्रणाम’ पुनर्वास केंद्र, डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग, ‘राइड अगेंस्ट कैंसर’ ऐप, और एचडीएफसी बैंक के सहयोग से मरीज सहायता कार्यक्रम हज़ारों ज़िंदगियों को सहारा दे रहे हैं। डॉ. मोनिका गुने (पूर्व WHO अधिकारी) उन्होंने कहा कि यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में कैंसर रोकथाम और स्क्रीनिंग को शामिल करना समय की मांग है। सरकार के विज़न को मिला विशेषज्ञों का समर्थन स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने माना कि भारत सरकार का बजट 2026-27 कैंसर के खिलाफ लड़ाई में एक मजबूत नींव रखता है। अब ज़रूरत है कि रोकथाम, शुरुआती जांच, जन-जागरूकता, और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को राष्ट्रीय अभियान का रूप दिया जाए। इंडियन कैंसर सोसायटी (ICS), दिल्ली आईसीएस दिल्ली कैंसर की रोकथाम, जल्दी पहचान, मरीज सहायता, पुनर्वास और एडवोकेसी के क्षेत्र में दशकों से सक्रिय है। वंचित समुदायों पर विशेष ध्यान देते हुए यह संस्था कैंसर के बोझ को कम करने और मरीजों व उनके परिवारों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। कैंसर अब सिर्फ बीमारी नहीं, राष्ट्रीय चुनौती है। सरकार के साहसिक बजटीय कदम, विशेषज्ञों की चेतावनी और समाज की भागीदारी—इन तीनों के संगम से ही लाखों ज़िंदगियां बचाई जा सकती हैं।
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