January 15, 2026
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सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले, समाज सुधार की नई राहवर्ष 2025 में शीर्ष अदालत ने कानून को दिया मानवीय और संवेदनशील चेहरा

  • January 2, 2026
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@नई दिल्ली अरुण शर्मा रिधि दर्पण !  नववर्ष 2026 की शुरुआत के साथ ही वर्ष 2025 के न्यायिक फैसलों पर नजर डालें तो यह साल सुप्रीम कोर्ट के

@नई दिल्ली अरुण शर्मा रिधि दर्पण ! 

नववर्ष 2026 की शुरुआत के साथ ही वर्ष 2025 के न्यायिक फैसलों पर नजर डालें तो यह साल सुप्रीम कोर्ट के लिए सामाजिक सुधारों की दृष्टि से बेहद अहम रहा। शीर्ष अदालत ने वैवाहिक विवादों से लेकर छात्रों की मानसिक सेहत और सड़क सुरक्षा तक, समाज से जुड़े कई ज्वलंत मुद्दों पर ऐसे फैसले दिए, जो आने वाले समय में दूरगामी प्रभाव डालेंगे।
वर्ष 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने 100 से अधिक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाए, जिनमें से कुछ फैसले समाज और कानून—दोनों के लिए मील का पत्थर साबित हुए। इनमें से निम्नलिखित पांच फैसले सबसे अधिक चर्चा में रहे—
498A मामलों में राहत, दो महीने तक गिरफ्तारी पर रोक
वैवाहिक विवादों में आईपीसी की धारा 498A के दुरुपयोग पर लगाम लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दो महीने तक गिरफ्तारी पर रोक लगाने का निर्देश दिया। अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा तय दिशा-निर्देशों को प्रभावी बनाए रखने को कहा। इस फैसले से दहेज कानून के दुरुपयोग पर अंकुश लगेगा और निर्दोषों को राहत मिलेगी।
सुरक्षित सड़कें जीवन के अधिकार का हिस्सा


एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुरक्षित, सुव्यवस्थित और वाहन-योग्य सड़कें संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि सड़कों के निर्माण और रखरखाव की जिम्मेदारी राज्य की है और इसे निजी एजेंसियों पर पूरी तरह नहीं छोड़ा जा सकता।
16 वर्षीय मुस्लिम लड़की का वैध विवाह मान्य
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के 2022 के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि 16 वर्ष की मुस्लिम लड़की किसी मुस्लिम पुरुष से वैध विवाह कर सकती है। शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी और दंपति को सुरक्षा देने के आदेश को सही ठहराया।
SC/ST एक्ट में अग्रिम जमानत पर संतुलित दृष्टिकोण
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि SC/ST Act के तहत अग्रिम जमानत तभी दी जा सकती है, जब प्रथम दृष्टया यह साबित हो जाए कि अधिनियम के तहत कोई अपराध बनता ही नहीं। यदि आरोप प्रारंभिक तौर पर निराधार पाए जाते हैं, तो अदालत धारा 438 के तहत विवेकाधिकार का प्रयोग कर सकती है।
मेंटल हेल्थ जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग
देश में छात्रों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं पर गंभीर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य भी अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने छात्रों की मानसिक सुरक्षा के लिए 15 अहम दिशा-निर्देश जारी किए।
इन निर्देशों के तहत जिन शिक्षण संस्थानों में 100 से अधिक छात्र अध्ययनरत हैं, वहां प्रशिक्षित काउंसलर, मनोवैज्ञानिक या सोशल वर्कर की नियुक्ति अनिवार्य कर दी गई है। इस फैसले को छात्र समुदाय के लिए ऐतिहासिक माना जा रहा है।
कानून को मिला मानवीय दृष्टिकोण
वरिष्ठ अधिवक्ता अनुराग जैन के अनुसार, वर्ष 2025 के ये फैसले यह दर्शाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने कानून के कठोर ढांचे को मानवीय संवेदनाओं से जोड़ते हुए समाज सुधार की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाए हैं। ये निर्णय आने वाले वर्षों में न्याय व्यवस्था की दिशा और दशा तय करेंगे।

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