January 15, 2026
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मानसिक स्वास्थ्य पर बड़ा अलर्ट इलाज में देरी से बीमारी बनती है गंभीर और स्थायी: डॉ. निमेष जी. देसाई

  • January 4, 2026
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@नई दिल्ली रिधि दर्पण अरुण शर्मा !  देश में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं। इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी (IPS) ने चेतावनी दी है

@नई दिल्ली रिधि दर्पण अरुण शर्मा ! 

देश में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं। इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी (IPS) ने चेतावनी दी है कि भारत में 80 से 85 प्रतिशत मानसिक रोगी समय पर या पर्याप्त इलाज से वंचित हैं। यह अहम खुलासा IPS के 77वें वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन ANCIPS 2026 (दिल्ली) के कर्टन रेज़र कार्यक्रम में किया गया। सम्मेलन का आयोजन 28 से 31 जनवरी तक यशोभूमि, नई दिल्ली में होगा।


इस अवसर पर ANCIPS आयोजन समिति के चेयरमैन और IHBAS के पूर्व निदेशक डॉ. निमेष जी. देसाई ने मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे पर सबसे कड़ा और स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि इलाज में देरी देश के लिए “साइलेंट इमरजेंसी” बन चुकी है।
डॉ. निमेष जी. देसाई की चेतावनी


डॉ. देसाई ने कहा,
“मानसिक रोगों का समय पर इलाज न होना बीमारी को गंभीर और स्थायी बना देता है। इससे विकलांगता, पारिवारिक तनाव, कामकाज की क्षमता में गिरावट और आत्महत्या का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। मानसिक स्वास्थ्य को भी शारीरिक स्वास्थ्य जितनी ही गंभीरता और प्राथमिकता मिलनी चाहिए।”
इलाज योग्य बीमारी, फिर भी 80% से ज्यादा उपेक्षित
कार्यक्रम में मौजूद IPS की अध्यक्ष डॉ. सविता मल्होत्रा ने कहा कि मानसिक रोग पूरी तरह इलाज योग्य हैं, लेकिन सामाजिक कलंक और जागरूकता की कमी के कारण मरीज इलाज तक नहीं पहुंच पाते।
“80 प्रतिशत से अधिक मरीजों का इलाज से बाहर रहना केवल चिकित्सा तंत्र की नहीं, बल्कि सामाजिक सोच की भी विफलता है। मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ना अनिवार्य है,”
— डॉ. सविता मल्होत्रा
भारत में इलाज का सबसे बड़ा अंतर
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NMHS) के आंकड़ों का हवाला देते हुए विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में
85% से अधिक लोग सामान्य मानसिक विकारों के बावजूद इलाज नहीं ले पाते
वैश्विक स्तर पर 70% मानसिक रोगी प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों तक नहीं पहुंचते
निम्न आय वाले देशों में यह आंकड़ा 10% से भी कम है
कलंक और जागरूकता की कमी बड़ी वजह
विशेषज्ञों के अनुसार, मानसिक बीमारी को आज भी कमजोरी या तनाव मान लिया जाता है।
डर रहता है कि
परिवार
कार्यस्थल
समाज
में बदनामी होगी, इसी कारण लोग महीनों और वर्षों तक इलाज नहीं कराते।
मानव संसाधन की भारी कमी
कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि देश में मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक, मानसिक स्वास्थ्य नर्स और मनोरोग सामाजिक कार्यकर्ताओं की भारी कमी है, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में। इससे इलाज की पहुंच और भी सीमित हो जाती है।
सम्मेलन बनेगा समाधान का मंच
ANCIPS दिल्ली के आयोजन सचिव और होप केयर इंडिया के निदेशक डॉ. दीपक रहेजा ने कहा कि आने वाला सम्मेलन मानसिक स्वास्थ्य सुधार की दिशा में निर्णायक साबित होगा।
“प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में मानसिक स्वास्थ्य का एकीकरण, बजट बढ़ाना, विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाना और निरंतर जागरूकता अभियान अब टाले नहीं जा सकते,”
— डॉ. दीपक रहेजा
बच्चे और बुज़ुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित
कार्यक्रम में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार,
करीब 80% बच्चे और किशोर मानसिक रोग के बावजूद इलाज से वंचित हैं
84% बुज़ुर्ग मानसिक रोगी बिना किसी उपचार के जीवन गुजार रहे हैं
स्पष्ट और सामूहिक संदेश
डॉ. निमेष जी. देसाई, डॉ. सविता मल्होत्रा और डॉ. दीपक रहेजा ने एक स्वर में कहा कि
मानसिक स्वास्थ्य के बिना स्वस्थ, सशक्त और आत्मनिर्भर भारत की कल्पना अधूरी है।
अब वक्त आ गया है कि मानसिक स्वास्थ्य को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाकर चुप्पी तोड़ी जाए और हर जरूरतमंद तक इलाज पहुंचाया जाए।

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