January 15, 2026
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भाषा से संस्कृति तक – उत्तराखंड की आत्मा को नया जीवन देने वाले सच्चिदानंद सेमवाल को हार्दिक बधाई

  • November 6, 2025
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हरीश रावत रिधि दर्पण ! ये तो इक रस्म-ए-जहाँ है जो अदा होती है,वर्ना सूरज की कहाँ सालगिरह होती है!”सबसे पहले सच्चिदानंद सेमवाल जी को हार्दिक शुभकामनाएँ और

ये तो इक रस्म-ए-जहाँ है जो अदा होती है,
वर्ना सूरज की कहाँ सालगिरह होती है!”
सबसे पहले सच्चिदानंद सेमवाल जी को हार्दिक शुभकामनाएँ और बधाई।
आपने जो कार्य किया है, वह केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा — उसकी भाषा, संस्कृति और पहचान को नया जीवन देने का एक दिव्य प्रयास है।
मैं सर्वप्रथम ईश्वर एवं आपके माता-पिता के चरणों में वंदन करता हूँ, जिन्होंने इस धरती को इतना विलक्षण, बहुमुखी और संवेदनशील व्यक्ति दिया।
आपके प्रयासों से आज हिमालय की वादियों में घंटों की घनघनाहट, शंखों का नाद और बर्फ से ढकी चोटियों से टकराकर आपकी सफलता का जयगान गूंज रहा है।
माँ लक्ष्मी स्वयं आपके माथे पर मंगल तिलक करें, सुख और सम्मान आपके द्वार पर द्वारपाल की तरह खड़े रहें।

विलक्षण, बहुमुखी, प्रखर मेधा के धनी —सच्चिदानंद सेमवाल
अक्सर ‘कद’ और ‘पद’ ये दो शब्द हमें दिग्भ्रमित करते हैं।
कभी पद से ही कद को माप लेते हैं, अथवा कभी पद को ही कद मान बैठते हैं।
ऐसे में यदि कद वास्तव में पद से बड़ा हो, तो भी हम पहले पद का मूल्यांकन करने लगते हैं।
किन्तु वस्तुतः ऐसी सोच के विमर्श अधिक समय तक नहीं टिकते।
कभी-कभी इन्हीं विमर्शों के मध्य यह प्रश्न भी उठ खड़ा होता है —


पहले कद है या पद है?”
गौर करें! भगवान बद्रीनाथ के एक ओर नर पर्वत और दूसरी ओर नारायण पर्वत खड़े हैं।
दोनों का कद विशाल है, किंतु वे तपोनिष्ठ हैं — कद और पद के अहंकार से पूर्णतया निर्लिप्त।
इसीलिए वे जन-जन के पूज्य हैं।
इसी प्रकार इस भौतिक जगत में भी कई ऐसी विभूतियाँ हैं जो अपने कद के मद से कोसों दूर रहकर,
विनम्रता और तपस्या से अपने कर्म क्षेत्र में निरंतर रत हैं।
ऐसी विभूतियाँ आज भी भीड़भाड़ के बीच स्पष्ट रूप से अलग दिखाई देती हैं —
बशर्ते हम उन्हें पहचानने की दृष्टि रखें।
हमारे मध्य ऐसी ही एक विनम्र, सृजनशील, मृदुभाषी और वाक्पटु विभूति हैं —
सच्चिदानंद सेमवाल जी,
जिनका जीवन, व्यक्तित्व और कार्य यह सिद्ध करता है कि “कद कभी पद का मोहताज नहीं होता,
बल्कि कर्म, संस्कार और समर्पण ही व्यक्ति को महान बनाते हैं।”

भाषा से संस्कृति तक – सच्चिदानंद सेमवाल की ऐतिहासिक पहल
29 अक्टूबर 2025 को अमेरिका के सिएटल और कनाडा के सरे-वैंकूवर में “भाषा एआई पोर्टल” का भव्य शुभारंभ हुआ।
गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी भाषाओं को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जोड़ने की यह ऐतिहासिक पहल उत्तराखंड के लिए गर्व का क्षण बनी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, लोकगायक प्रीतम भरतवाण और हजारों उत्तराखंडी इस कार्यक्रम से ऑनलाइन जुड़े।
इस पोर्टल ने उत्तराखंड की मातृभाषाओं को डिजिटल पहचान देकर “भाषा संरक्षण के वैश्विक मंच” पर स्थापित कर दिया।

🔹 बेटे के एक सवाल ने जगाई मातृभाषा की चेतना
सेमवाल जी के बेटे ने एक दिन चैटजीपीटी से अपनी भाषा के बारे में पूछा, पर वहाँ उत्तराखंड की कोई बोली उपलब्ध नहीं थी।
उसने पिता से कहा — “हमारी बोली का तो कोई डेटा नहीं है, कोई सीखना चाहे तो कैसे सीखेगा?”
यह सवाल सच्चिदानंद जी के हृदय में उतर गया और उसी पल उन्होंने ठान लिया कि
अपनी मातृभाषा को डिजिटल युग में सुरक्षित रखना ही उनका अगला जीवन-लक्ष्य होगा।
उन्होंने उत्तराखंड लौटकर लोकगायक प्रीतम भरतवाण जी सहित कई विद्वानों से विचार-विमर्श किया,
फिर अपनी मेहनत और निजी संसाधनों से “भाषा डेटा कलेक्शन पोर्टल” तैयार किया,
जहाँ लाखों शब्द, वाक्य, कहावतें और कहानियाँ संग्रहित की जा रही हैं।
उनका उद्देश्य है कि भविष्य की पीढ़ी अपनी भाषा को आसानी से सीख सके और बोलने में गर्व महसूस करे।

🔸 “भाषा बचेगी तो संस्कृति बचेगी” – यही उनका जीवन-मंत्र
सच्चिदानंद जी कहते हैं —

“कोई भी देश या राज्य तब खत्म होता है जब पहले उसकी भाषा, फिर संस्कृति, फिर संस्कार लुप्त होते हैं।”

उनकी यह सोच अब एक सामाजिक आंदोलन का रूप ले चुकी है।
वे चाहते हैं कि भाषा-विशेषज्ञ, लोक कलाकार, समाजसेवी और तकनीकी विशेषज्ञ
इस अभियान से जुड़ें ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी मातृभाषा को न केवल सीखे, बल्कि जिए भी।

🔹 मलेथा से अमेरिका तक की प्रेरक यात्रा
उत्तराखंड के मलेथा गांव में जन्मे सच्चिदानंद सेमवाल का बचपन संघर्षों और सपनों से भरा रहा।
छह किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाना, सीमित साधनों में पढ़ाई करना और फिर भी ऊँचे सपने देखना — यही उनकी पहचान रही।
परिवार ज्योतिष परंपरा से जुड़ा था, पर उनके चाचा ने नई राह दिखाई —
भोपाल में इंजीनियरिंग और फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस में मास्टर्स।
दुबई, यूरोप, स्विट्जरलैंड और अमेरिका तक की तकनीकी यात्रा में उन्होंने अनेक प्रोजेक्ट्स पर काम किया,
पर दिल हमेशा उत्तराखंड की मिट्टी और बोली से जुड़ा रहा।
दुबई में लोकगायक प्रीतम भरतवाण से मुलाकात ने उनके भीतर समाज के लिए कुछ करने का बीज बो दिया।
उन्होंने महसूस किया कि “तकनीक का असली उपयोग तब है जब वह अपनी जड़ों से जुड़कर समाज का उत्थान करे।”

🔶 उत्तराखंड की आत्मा को नया जीवन
जब उत्तराखंड की नई पीढ़ी अपनी भाषा भूलने लगी थी,
तब सच्चिदानंद सेमवाल जी ने डिजिटल युग में मातृभाषा को अमर करने का प्रण लिया।
उनका “भाषा एआई पोर्टल” केवल एक तकनीकी नवाचार नहीं,
बल्कि हमारी पहचान, संस्कृति और अस्तित्व के संरक्षण का आंदोलन है।

निष्कर्ष – एक प्रेरणा, एक आंदोलन
सच्चिदानंद सेमवाल जी ने सिद्ध कर दिया कि विदेश में रहकर भी
मातृभूमि और मातृभाषा की सेवा संभव है।
उनकी यह पहल न केवल उत्तराखंड बल्कि सम्पूर्ण भारत के लिए प्रेरणास्रोत है।
उनका जीवन, समर्पण और मातृभाषा के प्रति प्रेम हमें यह संदेश देता है —
“जो अपनी भाषा बचाता है, वही अपनी जड़ों को अमर करता है।”

🌸 सच्चिदानंद सेमवाल जी को हार्दिक बधाई 🌸
आपका नाम उत्तराखंड की भाषा चेतना के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज रहेगा।
आप सच-मुच “कर्मयोगी”, “विचारक” और “तकनीक से संस्कृति जोड़ने वाले सेतु” हैं।

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