January 15, 2026
दिल्ली

भावनात्मक सेहत से बनती है मजबूत ज़िंदगी: एम्स विशेषज्ञ ने बताए मानसिक स्वास्थ्य के सरल मंत्र

  • December 2, 2025
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नई दिल्ली अरुण शर्मा रिधि दर्पण !  किसी भी व्यक्ति के संपूर्ण विकास में उसकी भावनात्मक सेहत बेहद अहम भूमिका निभाती है। अगर इंसान भावनात्मक रूप से मजबूत

नई दिल्ली अरुण शर्मा रिधि दर्पण ! 

किसी भी व्यक्ति के संपूर्ण विकास में उसकी भावनात्मक सेहत बेहद अहम भूमिका निभाती है। अगर इंसान भावनात्मक रूप से मजबूत हो, तो वह मुश्किल हालात का सामना भी आसानी से कर पाता है। यही संदेश देते हुए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), दिल्ली के मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर नंद कुमार ने कहा कि भावनात्मक मज़बूती (इमोशनल रेज़िलियंस) आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में बेहद ज़रूरी है।

प्रोफेसर नंद कुमार ने बताया कि अच्छी वेलबीइंग के कई पहलू होते हैं—जैसे सामाजिक जुड़ाव, भावनात्मक जुड़ाव, नियमित कामकाज, शारीरिक रूप से सक्रिय रहना, सामाजिक गतिविधियों में शामिल होना और सबसे बड़ी बात, अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलना। उन्होंने कहा कि आज कई लोग हर चीज़ को बिल्कुल योजनाबद्ध और व्यवस्थित चाहते हैं—जैसे कैब समय पर मिले, कहीं देर न हो जाए आदि। लेकिन जिंदगी हमेशा हमारी मरज़ी के मुताबिक नहीं चलती, इसलिए थोड़ी देरी, थोड़ी असुविधा और थोड़ा तनाव स्वीकार करना सीखना चाहिए। यही स्वीकार्यता हमें अंदर से मजबूत बनाती है।

उन्होंने बच्चों का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर वे कहते हैं कि उन्हें बोरियत हो रही है, तो यह कोई समस्या नहीं है। बोरियत भी मन को रुककर सोचने और खुद को समझने का मौका देती है।

प्रोफेसर नंद कुमार ने यह भी बताया कि लगातार कुछ करते रहना हमेशा फायदेमंद नहीं होता। हमारा दिमाग इस तरह नहीं बना कि वह हर समय काम करता रहे। उसे समय–समय पर शांत रहने और सिर्फ आवाज़ें सुनने जैसी हल्की गतिविधियों की भी ज़रूरत होती है।

उन्होंने खान–पान के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव को लेकर कहा कि एक कहावत है—“भोजन को दवा की तरह लो, वरना दवा को भोजन की तरह लेना पड़ जाएगा।”
जब हम अधिक खाते हैं, गलत चीज़ें खाते हैं या बिल्कुल नहीं खाते, तो इसका सीधा असर हमारे शरीर में मौजूद ट्रिलियन्स माइक्रोबायोम पर पड़ता है। उन्होंने बताया कि हमारी आंतों में मौजूद बैक्टीरिया इस बात पर निर्भर करते हैं कि हम क्या खाते हैं।

अगर हम ज्यादा चीनी खाते हैं तो मूड पर तुरंत असर होता है। दही या प्रोबायोटिक खाने से शरीर हल्का महसूस करता है, जबकि पिज़्ज़ा या बर्गर जैसी चीज़ें तुरंत भारीपन पैदा करती हैं।
उन्होंने कहा कि खराब भोजन मानसिक स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचाता है और बाज़ार में मिलने वाले फूड ऑप्शन्स का बड़ा प्रभाव लोगों की पसंद पर पड़ रहा है।

प्रोफेसर नंद कुमार का संदेश साफ है—बेहतर मानसिक सेहत के लिए भावनात्मक ताकत बढ़ाएं, सही खान–पान अपनाएं, सक्रिय रहें और जीवन की छोटी–छोटी असुविधाओं को भी सहजता से स्वीकार करें।

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