बदलते दौर में हिंदू सम्मेलन:
- January 13, 2026
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एकता, चेतना और संस्कृति की रक्षा का राष्ट्रीय आह्वानजागरूक समाज, सशक्त युवा और समरस भारत की ओर कदम नई दिल्ली | विशेष रिपोर्टआज का भारत तेज़ी से बदलते
एकता, चेतना और संस्कृति की रक्षा का राष्ट्रीय आह्वानजागरूक समाज, सशक्त युवा और समरस भारत की ओर कदम नई दिल्ली | विशेष रिपोर्टआज का भारत तेज़ी से बदलते
एकता, चेतना और संस्कृति की रक्षा का राष्ट्रीय आह्वान
जागरूक समाज, सशक्त युवा और समरस भारत की ओर कदम
नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट
आज का भारत तेज़ी से बदलते सामाजिक, तकनीकी और वैश्विक परिदृश्य के बीच खड़ा है। एक ओर आधुनिकता और विकास की रफ्तार है, तो दूसरी ओर सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक एकता और मूल्यों को लेकर गहरी चिंताएँ भी उभर रही हैं। ऐसे समय में हिंदू सम्मेलन किसी एक वर्ग या विचारधारा का मंच नहीं, बल्कि हिंदू समाज की सामूहिक चेतना को जागृत करने, आत्ममंथन करने और भविष्य की दिशा तय करने का राष्ट्रीय प्रयास बनकर सामने आता है।
समाजसेवी अरुण शर्मा के अनुसार, हिंदू सम्मेलन का उद्देश्य किसी के विरोध में खड़ा होना नहीं, बल्कि अपने भीतर की शक्ति, परंपरा और मूल्यबोध को पहचानकर उसे राष्ट्रहित में सकारात्मक दिशा देना है। यह सम्मेलन संवाद, समाधान और समरसता का मंच है—जहाँ विचारों की दृढ़ता हो, लेकिन व्यवहार में मर्यादा और संवेदनशीलता बनी रहे।

क्यों आवश्यक है हिंदू सम्मेलन?
हिंदू समाज अपनी विविधता, सहिष्णुता और समन्वय के लिए विश्व में पहचाना जाता है। किंतु यही विविधता, यदि संगठित न हो, तो बिखराव का कारण भी बन सकती है। आज समय की मांग है कि—
समाज अपनी ऐतिहासिक जड़ों और सांस्कृतिक मूल्यों से गहराई से जुड़े।
भ्रम, अफवाह और नकारात्मक प्रचार का शांत, तथ्यपरक और विवेकपूर्ण उत्तर दिया जाए।
शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा, पर्यावरण और सामाजिक न्याय जैसे क्षेत्रों में साझी रणनीति बने।
संविधानसम्मत ढंग से अधिकारों और कर्तव्यों पर खुला संवाद हो।
हिंदू समाज के भीतर एकता, जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का भाव और मजबूत हो।
हिंदू सम्मेलन का मूल स्वर टकराव नहीं, बल्कि संतुलन और सामाजिक समरसता होना चाहिए।
हिंदू समाज की जागृति: भाषण नहीं, सतत कर्म
जागृति केवल मंचों से दिए गए संदेशों से नहीं आती, बल्कि निरंतर आचरण से जन्म लेती है—
परिवार और संस्कार: सत्य, करुणा, सहिष्णुता और राष्ट्रप्रेम की पहली पाठशाला।
शिक्षा और इतिहासबोध: आधुनिक ज्ञान के साथ सभ्यता और संस्कृति का वैज्ञानिक व तथ्यपरक अध्ययन।
सामाजिक संवाद: जाति, भाषा और क्षेत्र से ऊपर उठकर एक-दूसरे को सुनने और समझने की संस्कृति।
सेवा और सहभागिता: शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा-प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय भूमिका।
डिजिटल जिम्मेदारी: सोशल मीडिया के दौर में संयम, तथ्य और मर्यादा का पालन।
नारी सम्मान: संस्कृति की आत्मा
भारतीय परंपरा में नारी केवल पूज्य नहीं, बल्कि निर्माण, नेतृत्व और करुणा की शक्ति रही है। आज आवश्यकता है कि—
महिलाओं को शिक्षा, सुरक्षा और स्वास्थ्य में पूर्ण समानता मिले।
निर्णय प्रक्रिया में उनकी वास्तविक और प्रभावी भागीदारी हो।
नारी सम्मान केवल आयोजनों तक सीमित न रहे, बल्कि सामाजिक व्यवहार और नीतियों में दिखे।
जिस समाज में नारी सशक्त होती है, वही समाज सच्चे अर्थों में सुरक्षित और प्रगतिशील होता है।
प्रकृति, पशु और पर्यावरण सम्मान: हिंदू दृष्टि का मूल
हिंदू संस्कृति का आधार ही प्रकृति-पूजन, पशु-सम्मान और पर्यावरण-संरक्षण रहा है। नदियाँ माँ हैं, वृक्ष पूज्य हैं, और समस्त जीवों में जीवन का सम्मान निहित है। हिंदू सम्मेलन के माध्यम से—
स्वच्छ पर्यावरण और स्वच्छ हवा के लिए सामूहिक संकल्प,
जल, जंगल और जमीन के संरक्षण की चेतना,
पशु करुणा और प्रकृति-संतुलन का संदेश
को समाज के हर वर्ग तक पहुँचाना समय की आवश्यकता है।
युवा पीढ़ी के नाम संदेश
युवा किसी भी राष्ट्र की धड़कन होते हैं। उन्हें यह स्पष्ट संदेश देना जरूरी है—
अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व रखें, लेकिन अन्य समाजों के प्रति सम्मान बनाए रखें।
संविधान, राष्ट्र और मानवता—तीनों को साथ लेकर चलें।
आधुनिक तकनीक और उद्यमिता में आगे बढ़ें, पर मूल्यों से समझौता न करें।
हिंसा, नशा और घृणा से दूर रहकर रचनात्मकता, खेल, कला और सेवा को अपनाएँ।
जब युवा जागरूक होता है, तो समाज स्वतः संगठित और सशक्त होता है।
हिंदू एकता: सर्व समाज के हित में
आज यह स्पष्ट हो चुका है कि हिंदू समाज की एकता केवल हिंदुओं के लिए नहीं, बल्कि सर्व समाज की स्थिरता और राष्ट्र की मजबूती के लिए आवश्यक है। एक संगठित, संवेदनशील और सेवा-भाव से प्रेरित हिंदू समाज ही विश्व पटल पर अपनी विशिष्ट पहचान बना सकता है—एक ऐसी पहचान जो करुणा, सहिष्णुता और संतुलन की प्रतीक हो।
एक राष्ट्रीय संकल्प
यदि हिंदू सम्मेलन संविधानसम्मत, समावेशी और सेवा-आधारित सोच के साथ आगे बढ़ता है, तो वह केवल सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का वाहक बनेगा।
आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें—
विचारों में दृढ़ होंगे,
व्यवहार में मर्यादित होंगे,
और कर्म में राष्ट्रनिष्ठ होंगे।
यही सच्ची सांस्कृतिक रक्षा है,
यही समरस, सशक्त और जागृत भारत की नींव