January 15, 2026
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ड्यूटी में नशे पर भी नहीं चलेगी सीधी बर्खास्तगी: हाई कोर्ट का 20 साल पुराने केस में बड़ा फैसला

  • November 14, 2025
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हरि सिंह रावत रिधि दर्पण। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी असर वाला निर्णय सुनाते हुए कहा है कि ड्यूटी के दौरान शराब पीने की गलती

हरि सिंह रावत रिधि दर्पण।

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी असर वाला निर्णय सुनाते हुए कहा है कि ड्यूटी के दौरान शराब पीने की गलती पर किसी कर्मचारी को बिना चेतावनी सीधे नौकरी से निकाल देना कानून और न्याय—दोनों के खिलाफ है। कोर्ट का कहना है कि अनुशासन तो ज़रूरी है, लेकिन अनुशासन के नाम पर किसी कर्मचारी के पूरे जीवन और भविष्य को अचानक खत्म करना स्वीकार्य नहीं हो सकता।

यह फैसला न सिर्फ सुरक्षाबलों के हजारों जवानों के लिए, बल्कि उन सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए राहत बनकर आया है जो विभागीय कार्रवाई के दौरान कठोर फैसलों का सामना करते हैं।

20 साल पुराने केस पर बड़ा निर्णय

यह मामला वर्ष 2005 और 2006 का है, जब CRPF के जवान सुरजन सिंह पर आरोप लगा कि वे ड्यूटी के दौरान नशे में थे। विभागीय जांच चली, और बिना ज्यादा देर किए जवान को सीधे बर्खास्त कर दिया गया।

उनके पास कोई आखिरी चेतावनी नहीं दी गई, न सुधार का मौका। बस, एक आदेश—
“सेवा समाप्त।”

जवान ने इस फैसले को अन्यायपूर्ण बताते हुए कहा—

वे बीमार थे और दवाई ले रहे थे

उन्हें नशे में पाया जाने की घटना परिस्थितिजन्य थी

उनका पूरे करियर का रिकॉर्ड बेदाग रहा है

और बिना चेतावनी उन्हें निकाल दिया गया, जो अत्यधिक कठोर कदम था

मामला धीरे-धीरे दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा, और लम्बी कानूनी जद्दोजहद के बाद अदालत ने इस फैसले की गंभीर समीक्षा शुरू की।

हाई कोर्ट की सख्त और संतुलित टिप्पणी

कोर्ट ने विस्तृत सुनवाई के बाद कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जोर दिया—

. “सज़ा में संतुलन होना चाहिए”

हाई कोर्ट ने कहा कि अनुशासनात्मक कार्रवाई ज़रूर की जाए, लेकिन सज़ा अनुपातिक होनी चाहिए।
एक ही गलती पर किसी की नौकरी छीन लेना न्यायसंगत नहीं।

“बेहतरीन सेवा रिकॉर्ड को अनदेखा नहीं किया जा सकता”

जवान का पूरा सेवा इतिहास साफ-सुथरा था। कोर्ट ने कहा—> “कानून का यह मूल सिद्धांत है कि निर्णय कर्मचारी के संपूर्ण रिकॉर्ड को देखकर लिया जाए, न कि केवल एक घटना पर।”

“बिना अंतिम चेतावनी बर्खास्तगी अनुचित”

कोर्ट ने पूछा—
अगर किसी कर्मचारी को सुधारने का मौका ही नहीं दिया गया,
तो सीधे बर्खास्तगी किस आधार पर?

“अनुशासन ज़रूरी है, पर मानवता भी उतनी ही जरूरी है”

कोर्ट ने कहा कि सख्ती दिखाने के लिए किसी का करियर खत्म कर देना
न न्याय है, न प्रशासनिक विवेक।

जवान की नौकरी बहाल – आदेश रद्द

अदालत ने CRPF का बर्खास्तगी वाला आदेश रद्द करते हुए जवान को वापस सेवा में लेने का निर्देश जारी किया। साथ ही कहा कि—

कर्मचारी अपने सभी अधिकारों का हकदार रहेगा

उसकी सेवा अवधि की निरंतरता बनी रहेगी

और उसे न्यायसंगत तरीके से आगे बढ़ने का मौका दिया जाए

इस फैसले का व्यापक असर

यह फैसला उन तमाम सुरक्षाबलों और सरकारी विभागों के लिए महत्वपूर्ण नज़ीर बन गया है, जहाँ कभी-कभी छोटी गलती पर भी बड़े निर्णय ले लिए जाते हैं।

इस निर्णय से यह संदेश स्पष्ट है—

अनुशासन पर समझौता नहीं,

पर सज़ा में अत्यधिक कठोरता भी नहीं।

कर्मचारी इंसान है, मशीन नहीं—
उसे सुधारने का अवसर मिलना चाहिए।

यह फैसला यह भी बताता है कि न्यायालय केवल कानून की किताब नहीं देखता, बल्कि घटना की मानवीय संवेदनाओं को भी महत्व देता है।

इस निर्णय ने एक बेहद महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किया है—

“किसी एक गलती से पूरी ज़िंदगी नहीं बिगड़नी चाहिए।”

हाई कोर्ट का यह फैसला आने वाले समय में
कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए
उम्मीद की मजबूत किरण बनकर उभरेगा।

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