February 9, 2026
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डॉ. ज्योति अरोड़ा: जहां विज्ञान और संवेदना मिलती है, वहां स्तन कैंसर की खामोश पहचान संभव

  • January 21, 2026
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नई दिल्ली | विशेष संवाददाता : अरुण शर्माचिकित्सा विज्ञान जब मानवीय संवेदना से जुड़ता है, तब वह केवल इलाज नहीं करता, बल्कि जीवन को नई दिशा देता है।

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता : अरुण शर्मा
चिकित्सा विज्ञान जब मानवीय संवेदना से जुड़ता है, तब वह केवल इलाज नहीं करता, बल्कि जीवन को नई दिशा देता है। अपोलो अथीना वूमेन्स कैंसर सेंटर की सीनियर कंसल्टेंट और ब्रेस्ट रेडियोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. ज्योति अरोड़ा इसी विचार की जीवंत मिसाल बनकर उभरी हैं। उनके नेतृत्व में अपनाई गई अत्याधुनिक एमआरआई गाइडेड वैक्यूम-असिस्टेड ब्रेस्ट बायोप्सी (MRI-Guided VABB) तकनीक ने स्तन कैंसर की शुरुआती पहचान में ऐतिहासिक बदलाव लाया है।
डॉ. ज्योति अरोड़ा का मानना है कि कैंसर से लड़ाई की सबसे बड़ी जीत उसकी समय पर पहचान है। वे कहती हैं, “स्तन कैंसर कई बार बिना गांठ, बिना दर्द और बिना किसी लक्षण के बढ़ता रहता है। अगर हम उसे स्टेज-0 या स्टेज-1 पर पकड़ लें, तो महिला का जीवन ही नहीं, उसका आत्मविश्वास भी बचाया जा सकता है।”


भारत जैसे देश में यह चुनौती और गंभीर हो जाती है, जहां बड़ी संख्या में युवा महिलाओं के स्तन घने (डेंस ब्रेस्ट) होते हैं और पारंपरिक जांच तकनीकें कई बार असफल साबित होती हैं। मैमोग्राफी और अल्ट्रासाउंड के बावजूद 10 से 20 प्रतिशत मामलों में कैंसर छिपा रह जाता है। ऐसे में डॉ. ज्योति अरोड़ा के अनुभव और विशेषज्ञता से विकसित एमआरआई गाइडेड वीएबीबी तकनीक उन ‘खामोश कैंसरों’ तक पहुंच बनाती है, जो आंखों से नहीं दिखते, लेकिन जीवन के लिए घातक हो सकते हैं।


अपने करियर में 600 से अधिक वीएबीबी प्रक्रियाएं कर चुकीं डॉ. अरोड़ा बताती हैं कि यह तकनीक न केवल सटीक है, बल्कि न्यूनतम इनवेसिव भी है। इससे मरीज को कम दर्द, कम समय और ज्यादा भरोसेमंद परिणाम मिलते हैं। कई मामलों में कैंसर की पुष्टि स्टेज-0 यानी डीसीआईएस (DCIS) पर ही हो जाती है, जहां समय पर सर्जरी से मरीज पूरी तरह स्वस्थ जीवन की ओर लौट सकती है।
हाल ही में सामने आया एक मामला इस तकनीक की अहमियत को रेखांकित करता है। 70 वर्षीय महिला को निप्पल से रक्तस्राव की शिकायत थी, लेकिन मैमोग्राफी और अल्ट्रासाउंड सामान्य निकले। आमतौर पर ऐसे मामलों में मरीज को छह महीने बाद बुलाया जाता है, लेकिन डॉ. ज्योति अरोड़ा की पहल पर एमआरआई गाइडेड वीएबीबी किया गया। नतीजा—स्टेज-0 स्तन कैंसर की पहचान और समय रहते सर्जरी। महिला का जीवन बच गया, और कैंसर को आगे बढ़ने का मौका नहीं मिला।
डॉ. अरोड़ा मानती हैं कि विज्ञान तब तक अधूरा है, जब तक उसमें संवेदना न हो। “हर रिपोर्ट के पीछे एक महिला है, एक परिवार है। हमारा लक्ष्य केवल बीमारी पकड़ना नहीं, बल्कि डर को भरोसे में बदलना है,” वे कहती हैं।
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के आंकड़े बताते हैं कि भारत में महिलाओं में होने वाले कुल कैंसर मामलों में लगभग 28 प्रतिशत स्तन कैंसर के हैं और भविष्य में यह आंकड़ा और बढ़ने वाला है। ऐसे में डॉ. ज्योति अरोड़ा जैसी विशेषज्ञों की भूमिका सिर्फ डॉक्टर की नहीं, बल्कि आशा की किरण की बन जाती है।
अपोलो अथीना वूमेन्स कैंसर सेंटर में उनके नेतृत्व में अपनाई गई यह वैज्ञानिक और संवेदनशील सोच भारत को स्तन कैंसर की शुरुआती पहचान के वैश्विक मानचित्र पर मजबूती से स्थापित कर रही है—जहां इलाज केवल चिकित्सा नहीं, बल्कि मानवीय सेवा बन जाता है।

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