January 15, 2026
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जब शरीर सवाल पूछे, समाज चुप रहेइंटरसेक्स स्थितियाँ: जागरूकता, संवेदनशीलता और विज्ञान की साझा ज़रूरत

  • December 30, 2025
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अरुण शर्मा रिधि दर्पण ! कुछ परिवारों के लिए सवाल बच्चे के जन्म के साथ ही शुरू हो जाते हैं—जब नवजात के जननांग सामान्य रूप से लड़का या

अरुण शर्मा रिधि दर्पण !

कुछ परिवारों के लिए सवाल बच्चे के जन्म के साथ ही शुरू हो जाते हैं—जब नवजात के जननांग सामान्य रूप से लड़का या लड़की जैसे नहीं दिखते। वहीं कई मामलों में यह उलझन किशोरावस्था में सामने आती है, जब यौवन समय पर शुरू नहीं होता या शारीरिक बदलाव उम्मीद के अनुरूप नहीं होते। ऐसी स्थितियाँ, जिन पर अक्सर समाज चुप्पी साध लेता है, मेडिकल विज्ञान में इंटरसेक्स स्थितियाँ या डिफरेंसेज़ ऑफ सेक्स डेवलपमेंट (DSD) कहलाती हैं।


चिकित्सकों के अनुसार, DSD कोई एक बीमारी नहीं, बल्कि जैविक स्थितियों का ऐसा समूह है जिसमें व्यक्ति के क्रोमोसोम, गोनैड्स (अंडाशय या अंडकोष) या शारीरिक विकास सामान्य ढंग से नहीं होता। भले ही इस विषय पर खुलकर चर्चा कम होती हो, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि हर 4,000 से 5,000 लोगों में से एक व्यक्ति किसी न किसी रूप में DSD से प्रभावित होता है।
बाल एंडोक्राइनोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. वंदना जैन और डॉ. रजनी शर्मा बताती हैं कि DSD भ्रूण के शुरुआती विकास के दौरान होने वाले हार्मोनल और जैविक बदलावों का नतीजा होती है। कभी अंडाशय या अंडकोष पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते, तो कभी हार्मोन कम या ज्यादा बनते हैं, या उनके असर में गड़बड़ी हो जाती है। यही कारण है कि कुछ बच्चों में जन्म के समय ही अंतर दिखाई देता है, जबकि कुछ मामलों में समस्या यौवन के दौर में सामने आती है।
विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि DSD को ट्रांसजेंडर पहचान से जोड़ना एक बड़ी गलतफहमी है। DSD शरीर के जैविक विकास से जुड़ी स्थिति है, जबकि जेंडर आइडेंटिटी व्यक्ति की मानसिक और भावनात्मक पहचान होती है, जो DSD से अलग विषय है।
बाल शल्य चिकित्सक डॉ. डी. के. यादव के अनुसार, DSD केवल बाहरी जननांगों तक सीमित नहीं रहती। कई मामलों में शरीर के अंदर मौजूद प्रजनन अंग भी प्रभावित हो सकते हैं, जिसका असर यौवन, भविष्य में संतान क्षमता, हार्मोन संतुलन और दीर्घकालिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। कुछ स्थितियों में कैंसर का खतरा बढ़ने के कारण लंबे समय तक मेडिकल निगरानी जरूरी होती है।
इस पूरी प्रक्रिया में मानसिक और भावनात्मक देखभाल उतनी ही अहम है। मनोचिकित्सक डॉ. राजेश सागर बताते हैं कि DSD से जुड़े बच्चे और उनके परिवार सामाजिक दबाव, डर और असमंजस से गुजरते हैं। ऐसे में सही काउंसलिंग परिवार को जल्दबाज़ी में फैसले लेने से रोकती है और बच्चे को आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने में मदद करती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि समाज की शर्म और गलत धारणाएँ आज भी सबसे बड़ी बाधा हैं। कई परिवार दबाव में आकर जल्द सर्जरी का फैसला कर लेते हैं, ताकि बच्चा ‘सामान्य’ दिखे। डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि बिना पूरी जानकारी और विशेषज्ञ सलाह के ऐसे कदम भविष्य में गंभीर शारीरिक और मानसिक समस्याएँ पैदा कर सकते हैं।
अब इलाज का दृष्टिकोण बदल रहा है। जोर जल्दबाज़ी वाली सर्जरी के बजाय बच्चे को केंद्र में रखकर समग्र और मानवीय उपचार पर दिया जा रहा है। एंडोक्राइनोलॉजिस्ट, सर्जन और मनोचिकित्सक की संयुक्त टीम परिवार के साथ मिलकर निर्णय लेती है, ताकि बच्चे का शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास सुरक्षित रह सके।
डॉक्टरों का संदेश साफ है—चुप्पी और डर नहीं, सही जानकारी और संवेदनशीलता ज़रूरी है। आधुनिक चिकित्सा का उद्देश्य बच्चे को “ठीक करना” नहीं, बल्कि उसे सम्मान, समझ और सहयोग के साथ स्वस्थ जीवन जीने में सक्षम बनाना है। इंटरसेक्स स्थितियों पर खुलकर बात करना अब केवल मेडिकल ज़रूरत नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

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