February 9, 2026
उत्तर प्रदेश

एमबीबीएस की चाह में खौफनाक कदम: दिव्यांग कोटा पाने के लिए युवक ने खुद काट डाला पैर का हिस्सा

  • January 24, 2026
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वाराणसी | विशेष संवाददाता :रिधि दर्पण/ अरुण शर्मा एमबीबीएस में दाखिले की अंधी चाह और दिव्यांग कोटे का लाभ पाने की जिद ने इंसानियत को झकझोर देने वाला

वाराणसी | विशेष संवाददाता :रिधि दर्पण/ अरुण शर्मा


एमबीबीएस में दाखिले की अंधी चाह और दिव्यांग कोटे का लाभ पाने की जिद ने इंसानियत को झकझोर देने वाला मामला सामने लाया है। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के 24 वर्षीय युवक ने कथित तौर पर खुद अपने बाएं पैर का हिस्सा काट लिया, ताकि वह नीट के जरिए मेडिकल कॉलेज में दिव्यांग कोटा के तहत प्रवेश पा सके।
पुलिस के अनुसार, खलीलपुर निवासी सूरज भास्कर, जो डी-फार्मा कर चुका था और नीट की तैयारी कर रहा था, ने 18 जनवरी को पुलिस को सूचना दी कि उस पर हमला हुआ है और हमलावरों ने उसका बायां पैर काट दिया है। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या के प्रयास का मामला दर्ज किया।
हालांकि, जांच आगे बढ़ने पर कहानी ने चौंकाने वाला मोड़ ले लिया। पूछताछ के दौरान सूरज के बयान बार-बार बदलते रहे। पुलिस को जब उसके डायरी के पन्ने और उसकी गर्लफ्रेंड का बयान मिला, तो सच्चाई सामने आ गई।
डायरी में सूरज ने वर्ष 2026 में एमबीबीएस में दाखिला लेने की योजना और उससे जुड़ी मानसिक उलझनों का जिक्र किया था। उसकी गर्लफ्रेंड ने पुलिस को बताया कि सूरज किसी भी कीमत पर मेडिकल कॉलेज में प्रवेश चाहता था और इसी हताशा में उसने यह खौफनाक कदम उठाया।


पुलिस के मुताबिक, अक्टूबर 2024 में सूरज ने बीएचयू में दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवाने की कोशिश भी की थी, लेकिन वहां उसे सफलता नहीं मिली। इसी निराशा के चलते उसने कथित तौर पर मशीन की मदद से खुद अपना पैर काट लिया।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच में भी यह स्पष्ट हुआ कि घटना की रात कोई बाहरी व्यक्ति वहां मौजूद नहीं था।

पुलिस ने उस निर्माणाधीन मकान की तलाशी ली, जहां सूरज ने यह कृत्य किया था। आसपास से इंजेक्शन और संदिग्ध दवाइयों के साक्ष्य भी बरामद हुए हैं, जिससे आशंका जताई जा रही है कि उसने दर्द कम करने के लिए एनेस्थेटिक का इस्तेमाल किया।
फिलहाल पुलिस ने पहले दर्ज एफआईआर की दिशा बदलते हुए मामले की कानूनी और चिकित्सकीय पहलुओं से गहन जांच शुरू कर दी है। यह घटना न केवल सिस्टम में मौजूद खामियों की ओर इशारा करती है, बल्कि मेडिकल प्रवेश की दौड़ में बढ़ते मानसिक दबाव पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।

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